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कांग्रेस सरकार का बिजली खऱीद समझौतों पर लाया गया ‘व्हाइट पेपर’ महज़ झूठ का पुलिंदा- अमन अरोड़ा

  • -पछवाड़ा कोयला भंडार को शुरू करने के बजाय निजी कोयला भंडारों से घटिया कोयला महंगी दरों पर खऱीद रही है सरकार
  • -कांग्रेस सरकार चुनाव के मद्देनजऱ महज़ शिगुफेबाजी कर लोगों के सिर मढ़ रही हज़ारों करोड़ों रूपए का कज़ऱ्- अमन अरोड़ा

चंडीगढ़

आम आदमी पार्टी (आप) पंजाब के वरिष्ठ नेता एवं विधायक अमन अरोड़ा ने पंजाब के घातक बिजली समझौतों पर कांग्रेस सरकार को घेरा और कई ऐसे सवाल खड़े किए, जिनका जवाब न तो कांग्रेस की पहले की कैप्टन सरकार ही दे सकी और मौजूदा चरणजीत सिंह चन्नी की सरकार भी पल्ला झाड़ते हुए पंजाब के लोगों को गुमराह करने में जुटी है। पार्टी मुख्यालय में मंगलवार को विधायक अमन अरोड़ा ने प्रेस वार्ता को संबोधित करते हुए कहा कि कांग्रेस सरकार भी अकाली-भाजपा सरकार की तरह बिजली खऱीद समझौतों पर पंजाब से धोखाधड़ी कर रही है। उन्होंने कहा कि बिजली खऱीद समझौतों के आधार पर व्हाइट कॉलर माफिय़ा पौने पांच वर्षों से जस का तस है, जो मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी की नाक तले बदस्तूर जारी है। ‘आप’ द्वारा पंजाब विधानसभा में मामला उठाया जाता रहा, लेकिन कांग्रेस सरकार इससे भागती रही और चुप्पी साधे बैठी है। अमन अरोड़ा ने कहा कि तीनों निजी थर्मल पावर प्लांट प्रति वर्ष पंजाब को हज़ारों करोड़ रुपये का चूना लगा रहे हैं। कैप्टन अमरिंदर सिंह भी व्हाइट पेपर लेकर लाए थे, लेकिन फिर उसे छाती से लगाकर वापस ले गए। अकाली-भाजपा व कांग्रेस एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं और पंजाब में व्हाइट माफिय़ा को चलाया जा रहा है। अमन अरोड़ा ने बीते दस वर्ष का अकाली-भाजपा और मौजूद कांग्रेस सरकार का लेखाजोखा अपने पास मौजूद व्हाइट पेपर के ज़रिए दिखाया। उन्होंने कहा कि पंजाब सरकार केवल चुनाव के मद्देनजऱ लोगों की आंखों में धूल झोंकने में जुटी है। अमन अरोड़ा ने कहा कि बिजली खऱीद समझौतों के संबंध में चन्नी सरकार में मनप्रीत सिंह बादल व्हाइट पेपर लेकर तो आए लेकिन यह व्हाइट बुकलेट केवल झूठा का पुलिंदा है। असल व्हाइट पेपर 17 पेज का है लेकिन अकाली सरकार के समय जो हुआ उसे बयां करने के अलावा कांग्रेस सरकार के समय 2006 और उसके बाद इन पौने पांच वर्ष की करतूतों को छुपाया गया। इस कारण इन व्हाइट पेपर की संख्या घटकर 9 करके मनप्रीत सिंह बादल उसे लेकर आए।

1. मनप्रीत सिंह बादल ने वर्ष 2007 से बात शुरू की लेकिन इन बिजली खऱीद समझौतों को कांग्रेस की कैप्टन अमरिंदर सिंह की सरकार में 24 मार्च 2006 को मंजूरी मिली थी। बणांवाली और राजपुरा यूनिट से एक-एक हज़ार यूनिट, यानि कुल दो हज़ार यूनिट लगाने की मंजूरी मिली थी। लेकिन चुनाव से कऱीब 14 दिन पूर्व पीएसपीसीएल की दो हज़ार मेगावाट यूनिट कैप्टन अमरिंदर सिंह की सरकार के समय 20 जनवरी 2017 को बढ़ाकर 2400 मेगावाट कर दी गई थी। अकाली-भाजपा सरकार ने बिल होम ऑपेरेट एंव ट्रांसफर (बीओओटी) को बदलकर बीओओ कर दिया। क्योंकि बीओओटी के अनुसार जो यूनिट 25 वर्ष बाद पंजाब की होनी थी। लेकिन सरकार ने 20 जनवरी 2007 को इसे बदलकर बिल्ड ऑन ऑपरेट (बीओओ) कर दिया गया। कांग्रेस सरकार पंजाब को बर्बाद करने में अकाली-भाजपा सरकार जितनी ही भागीदार है।
2. दस अक्तूबर 2007 को अकाली-भाजपा सरकार की कैबिनेट में मनप्रीत बादल खज़़ाना मंत्री थे और प्रकाश सिंह बादल मुख्यमंत्री थे। उस समय सरकार ने बीओओटी के बजाय बीओओ ग़लती से अंकित होने की दलील दी थी। क्योंकि पहले कैप्टन अमरिंदर, फिर प्रकाश बादल और उनके बीच में कॉमन लिंक मनप्रीत सिंह बादल ही थे, जो अब चन्नी सरकार में भी कैबिनेट मंत्री है। 3. कऱीब साढ़े 2200 एकड जमीन भी पंजाब सरकार ने खरीदकर दी। मनप्रीत बादल और पंजाब सरकार ने माना कि सेंट्रल सेक्टर को सरकार को 1482 करोड़ और तीनों निजी थर्मल पावर प्लांट को एनपीए जीबीके 3620 करोड़ रुपये महज़ इन चार वर्षों में, यानि पांच हज़ार करोड़ से अधिक है, इन थर्मल पावर प्लांट को फिक्स चार्ज के रूप में दे चुके हैं।

पंजाब सरकार ने बिजली समझौते करने के समय कोई सेफ गार्ड नहीं रखा। गर्मियों में धान की बिजाई होनी है तो 14 हज़ार मेगावाट की जरूरत पड़ती है और सर्दियों में 6 हज़ार मेगावाट फिर 3 हज़ार मेगावाट जरूरत होती है। लेकिन इसे अनदेखा कर बिजली खऱीद समझौते कर लिए गए। जबकि गुजरात थर्मल पावर प्लांट की तरह सेक्शन-9 व सेक्शन-11 का ध्यान नहीं रखा गया। सेक्शन-9 के तहत राज्य सरकार लिखकर दे कि किन महीनों में बिजली की जरूरत नहीं तो थर्मल प्लांट कहीं भी बाहर बिजली बेच सकता है और सरकार फिक्स चार्ज से बच सकती है। पंजाब को महज़ 4-5 महीने महीने के लिए ही 14 हज़ार मेगावाट बिजली चाहिए, यदि समय से लिखकर दिया जाता तो इससे बचा जा सकता है लेकिन कांग्रेस सरकार ने ऐसा कुछ नहीं किया। सेक्शन-11 के अनुसार टोटल प्रोडक्शन कॉस्ट पर 20 प्रतिशत बिजली मिलने से लाभ मिल सकता था लेकिन निजी थर्मल पावर प्लांट्स से कोई बातचीत नहीं की गई।
मनप्रीत बादल ने लिक्विडेटेड डैमेज चार्ज, यानि प्रोजेक्ट लगने में देरी होने पर तलवंडी और राजपुरा का एक हज़ार करोड़ रुपये में से एक रुपया भी पंजाब सरकार रिकवर नहीं कर सकी है। बिजली खऱीद समझौते ग़लत होने के कारण कऱीब 7600 करोड़ रुपये से अधिक पंजाब को भुगतान करना पड़ेगा।
इसके अलावा कोयला ट्रांसपोर्टेशन चार्ज के रूप में पीएसपीसीएल को 3400 करोड़ रुपये देने पड़ गए। लेकिन बीते साढ़े तीन वर्ष में रिवीजन पिटीशन किसी भी कोर्ट में दायर नहीं की गई।
पंजाब सरकार पछवाड़ा कोयला भंडार को शुरू करने के बजाय निजी कोयला भंडार से महंगी दरों पर लॉ क्वालिटी का कोयला खऱीद रही है। इससे सात सौ करोड़ रुपये का अतिरिक्त भार पंजाब के लोगों के सिर पड़ रहा है। लेकिन पछवाड़ा कोयला भंडार को शुरू करने के लिए पौने पांच वर्ष में एक चि_ी भी नहीं लिखी। वही एप्टा कंपनी ने पंजाब सरकार पर 1652 करोड़ रुपये की रिकवरी का केस डाला हुआ है लेकिन कांग्रेस सरकार इसपर भी चुप्पी साधे बैठी है।
कांग्रेस सरकार ने बठिंडा थर्मल प्लांट चलाए रखने का दावा किया था लेकिन 737 करोड़ रुपये के ख़र्च से तैयार थर्मल प्लांट सहित रोपड़ की दो यूनिट भी बंद कर दी गई, जबकि वह 2030-31 तक चल सकती थी।
1. तीन साल में थर्मल पावर प्लांट से पांच बिजली खऱीद समझौते किए गए। 22 अप्रैल 2007 को मुंद्रा (टाटा) का, जो 90 पैसे प्रति यूनिट। फिर 7 अगस्त 2008 को रिलायंस से 17 पैसे प्रति यूनिट और फिर 2008-9 व 2010 में टीएसपीएल, जीबीएल, एनपीएल से किए 1.38 पैसे से लेकर 2.20 पैसे तक के अनुबंध शामिल हैं। पंजाब की समस्याओं की जड़ अकाली-भाजपा व कांग्रेस सरकार ही रही हैं और अब कांग्रेस सरकार महज़ चुनाव के मद्देनजऱ शिगुफेबाजी में लगी है। अमन अरोड़ा ने कहा कि जब रेट निर्धारित पीएसआरसी को ही करने हैं तो कांग्रेस सरकार कहज क़ानून लाकर क्या करेगी।
वहीं अमन अरोड़ा ने आगे बताया कि पंजाब सरकार ने दामोदर वैली के चार प्रोजेक्ट को टर्मिनेशन का नोटिस भेजा था लेकिन हाइएस्ट बिजली रेगुलेशन बॉडी एप्टा की ने पंजाब सरकार से पूछ लिया कि रद्द करने वाले आप कौन होते हो? अमन अरोड़ा ने कहा कि समझौता रद्द करने का आधार महंगी बिजली दर को बनाया ही नहीं जा सकता। पंजाब सरकार ने बीत दिनों बिजली तीन रुपये सस्ती तो की लेकिन पैसा कहां से और कैसे बचाना है, यह नहीं बताया गया। सरकार पर 2010-11 में 20 हज़ार करोड़ का कज़ऱ् था अब 36 करोड़ का कज़ऱ् हो चुका है। पंजाब सरकार पीएसपीसीएल की तरह ही पंजाब को दिवालिया बनाने में जुटी है।

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