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हरियाणा का अलग हाईकोर्ट के पक्ष में उतरे पूर्व अध्यक्ष बार काउंसिल

  • हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के बयान का किया समर्थन
  • अलग उच्च न्यायालय से मिलेगा अधिवक्ताओं और वादियों जल्द न्याय: रणधीर सिंह बधराण
  • कहा: मुख्यमंत्री के बयान से अधिवक्ताओं की लंबित मांगों को मिला बल

पंचकूला

हरियाण प्रदेश का अपना अलग हाईकोर्ट की मांग काफी समय से चली आ रही है। पिछल्ली सरकारो में भी यह मांग उठती रही है। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के 2013 की मांग के बाद अब पिछल्ले दिनो दिल्ली में हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने भी हरियाणा के अलग उच्च न्यायालय की मांग की है। इसी बयान को लेकर रणधीर सिंह बधराण पूर्व अध्यक्ष बार काउंसिल पंजाब और हरियाणा चंडीगढ़ एवं जनशक्ति आवाज मंच के सयोजक ने कहा कि दिल्ली में न्यायाधीशों और मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने हरियाणा में अलग हाईकोर्ट के ब्यान के बाद हरियाणा के अधिवक्ताओं की लंबे समय से लंबित मांगों को बल मिला। पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय दोनों राज्यों और केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ का संयुक्त है। इस बयान के बाद कानूनी बिरादरी के साथ-साथ हरियाणा के वादी दोनों ही काफी खुश है। पंजाब और हरियाणा की बार काउंसिल में 1 लाख से अधिक अधिवक्ता नामांकित हैं और पंजाब और हरियाणा चंडीगढ़ में अधिवक्ता के रूप में अभ्यास कर रहे हैं। वर्तमान में पार्किंग की समस्या के कारण अधिवक्ताओं और वादियों को भी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। अधिवक्ताओं के केबिनों सहित अन्य समस्याओं का भी समाधान किया जाएगा। कानूनी पेशे में आने वाले नए अधिवक्ताओं के लिए भी यह बेहतर रहेगा। दोनों सरकारों को व्यापक जनहित में बिना किसी राजनीतिक के समय-समय पर इस मुद्दे को सुलझाना चाहिए। अन्यथा यह मुद्दा कभी हल नहीं होगा। पंजाब और हरियाणा के अलग-अलग उच्च न्यायालय के गठन के बाद अधिवक्ताओं और वादियों की लंबी मांगों को पूरा किया जाएगा। रणधीर सिंह बधराण ने कहा कि जब वह बार काउंसिल के अध्यक्ष थे तो उन्होंने खुद अलग उच्च न्यायालय की मांग उठाई लेकिन राजनीतिक कारणों से इसे पूरा नही किया जा सका।

हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने शनिवार नई दिल्ली में विज्ञान भवन में विधि और न्याय मंत्रालय द्वारा आयोजित उच्च न्यायालयों के मुख्यमंत्रियों और मुख्य न्यायाधीशों का सम्मेलन, में कहा कि हरियाणा और पंजाब ने दोनों राज्यों के लिए अलग उच्च न्यायालय स्थापित करने की मांग की है और इस संबंध में दोनों राज्य अपने प्रस्ताव विधिवत केंद्रीय गृह मंत्रालय को भेजेंगे। पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने भी पंजाब के लिए एक अलग उच्च न्यायालय की स्थापना की मांग की। रणधीर सिंह बधराण बताया कि 2013 में मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने भी दिल्ली विज्ञान भवन में राज्यों के मुख्यमंत्रियों और उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों के एक सम्मेलन को संबोधित करते हुए यह मांग की थी।

उच्च न्यायालय के गठन से मामलों का जल्द निपटारा
अलग उच्च न्यायालय की स्थापना के बाद चंडीगढ़ में स्थापित कई ट्रिब्यूनल और दोनों राज्यों के मामलों से निपटने को कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल सहित अलग किया जा सकता है। वर्तमान में दोनों राज्यों के साथ-साथ केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ के लगभग चार लाख मामले पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के समक्ष लंबित हैं। पंजाब आद हरियाणा उच्च न्यायालय के समक्ष कुल मामले लगभग 400000 हैं और जिला और अधीनस्थ न्यायालयों और अधीनस्थ न्यायालयों में पंजाब के 517970, हरियाणा के 590343 और चंडीगढ़ के 43121 हैं। अद्यतन आंकड़ों के अनुसार कुल लंबित मामले 1550428 हैं। अलग उच्च न्यायालय के गठन के बाद मामलों का निपटारा और बेहतर होगा और यह न्याय वितरण प्रणाली में जनता के विश्वास को और मजबूत करेगा।

रणधीर सिंह बधराण ने कहा कि उच्च न्यायालय ने 17 जनवरी, 1955 से चंडीगढ़ में अपने वर्तमान भवन से काम करना शुरू कर दिया। हालांकि राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 द्वारा पेप्सू राज्य को पंजाब राज्य में मिला दिया गया था। पेप्सू उच्च न्यायालय के न्यायाधीश पंजाब उच्च न्यायालय के न्यायाधीश बने। पंजाब उच्च न्यायालय की शक्ति, जिसमें मूल रूप से 8 न्यायाधीश थे, बढ़कर 13 हो गई। पंजाब उच्च न्यायालय ने उन क्षेत्रों पर भी अधिकार क्षेत्र ग्रहण किया जो पहले पेप्सू उच्च न्यायालय के अधीन थे। राज्य पुनर्संगठन अधिनियम, 1966, 1 नवंबर 1966 से एक और राज्य हरियाणा और केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ को अस्तित्व में लाया। उक्त पुनर्संगठन अधिनियम के लागू होने की तारीख से, पंजाब के उच्च न्यायालय का नाम बदलकर पंजाब और हरियाणा के उच्च न्यायालय कर दिया।

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